सतर्क शिवराज
सरकार की तरफ देखें तो सीएम शिवराज के पूरे कार्यकाल की सक्रियता सराहनीय है . मध्यप्रदेश को शिवराज की विकास नीति ने अवश्य ही देश के शीर्ष राज्यों में ला खड़ा किया है. विकास के दावों वादों के साथ किए गए विकास से काफी हद तक संभव है कि जनता शिवराज के सिर ताज सजा दे लेकिन क्या सिर्फ विकास के नाम पर चुनाव जीता जा सकता है ? उदाहरण के तौर पर बिहार और गुजरात को लिया जा सकता है. हम सबने देखा कि वहां जनता ने विकास के नाम पर वोट डाले और नीतीश व मोदी का जीत हुई. पर भारतीय राजनीति में चुनाव में जीत सिर्फ माहौल अपने पक्ष में हो तथा विकास की बयार बह रही हो बस इतनी सी बात पर निर्भर नहीं करती. यह बात सीएम शिवराज अच्छे से जानते हैं शायद इसलिए अपने हालिया बयान में शिवराज ने कार्यकर्ताओं तथा नेताओं को ‘फिल गुड’ की स्थिति से निकलने का आह्वान किया. 9 साल पहले कौन कह सकता था कि कांग्रेस का प्रदेश से सुपड़ा साफ हो जाएगा.इससे साफ होता है कि चुनाव सिर्फ माहौल के अपने पक्ष में रहने पर नहीं जीता जाता. कई असंख्य चीजें इसमें अपनी भूमिका निभाती है. शिवराज की सक्रियता और सतर्कता ऐसी स्थिति में काफी अहम है.
एंटी इनकॉम्बेंसी का कितना असर ?
जैसा कि हर चुनाव से पहले सरकार से खफा लोगों की एक जमात नजर आती है. कभी- कभी ये स्थिति होने का बावजूद भी नजर नहीं आती. उदाहरण के तौर पर 9 साल पहले का कांग्रेस सरकार को ले लें. सरकार के खिलाफ इतने लोग थे इसकी छवि साफ नहीं दिख रही थी. अंतत: कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई. उदाहरण तो उत्तरप्रदेश में माया की करारी हार का भी लिया जा सकता है. लेकिन क्या ऐसी स्थिति मध्यप्रदेश में भी है. फिलहाल कुछ उदाहरण तो ऐसे भी हैं जहां विकास के मुद्दे ने एंटी इनकॉम्बेंसी को मात दे दी. बिहार में नीतीश और गुजरात में मोदी ने विकास की राह पर चुनाव जीत कर दिखाया है. शिवराज भी चुनाव को विकास पर ही केंद्रित करते दिखते हैं. सरकार में शिवराज के प्रयासों से विकास दिखने भी लगा है. चाहे बिजली की बात करें या कृषि क्षेत्र के विकास की. विकास दिखता है. जमीन के साथ साथ मीडिया में भी.
संगठन की मजबूती
चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के लिए चाहिए मजबूत संगठन और समर्पित कार्यकर्ता. इसमें कोई दे मत नहीं कि भाजपा संगठन की दृष्टिकोण से पहले से भी अधिक मजबूत हो चुकी है. सत्ता में रहते हुए संगठन के काम पर भी बराबर ध्यान दिया गया. इसका उदाहरण पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा के परिश्रम की बदौलत भाजपा ने प्रदेश में 65 लाख नए सदष्य बनाए. सत्ता में लंबे समय तक रहने पर गुटबाजी की संभावनाएं जरूर रहती है सो भाजपा में भी गुटबाजी की अटकलें लगाई जाने लगी. बहरहाल अभी तक किसी खुले मंच पर इस तरह के संकेत नहीं मिले हैं. वहीं कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस के संगठन में अब भी हाई कमान का अनुशासन अपने जड़ जमाए हुए है. पर जयों-जयों चुनाव नजदीक आ रहा है संगठन में फूट नजर आने लगी है. विदिशा में हुए कांग्रेस की बैठक में हंगामें ने तस्वीर के काफी कुछ साफ कर दिया. टिकट बंटते समय तक बगावत के सुर स्पष्ट होते जाएंगे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कई बार इस गुटबाजी पर चिंता जता चुके हैं. प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूरिया भी इस गुटबाजी से परिचित हैं. सागर में कार्यकर्ताओं के बगावती तेवर भी भूरिया ने देखा है. कांग्रेस में उनकी सुनी नहीं जा रही उनका ये दर्द भी गाहे बगाहे जाहिर हो जाती है.
जहां तक सक्रियता या सक्रियता दिखाने का सवाल है तो यहां विपक्ष चुनाव नजदीक आते ही जाग चुका है. सक्रिय दिखने या यूं कहें कि मिडिया में खबर बनने के फेर में युवा कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष सरकार के हर कदम का विरोध करने की ठान चुका है. लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने के बाद कांग्रेस के लिए फिर अगले 5 साल तक सत्ता से दूर रहना संगठन और मनोबल के लिहाज से कितना घातक हो सकता है, यह बात कांग्रेस से बेहतर कौन जान सकता है. जनता से जुड़ने की या ये कहें की समाज के हर वर्ग से जुड़ने की की कवायद में सीएम सिवराज ने युवा पंचायत, केश शिल्पी पंचायत, किसान पंचायत सहित अनेकों कार्यक्रम कर डाले. वहीं सक्रिय दिखने के लिए लगभग सरकार के हर कदम का कांग्रेस ने विरोध किया. मतलब सरकार भी सक्रिय और विपक्ष भी सक्रिय ! मगर ये नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में जनता का दिल वही जीतता है जिसके पास अपना मुद्दा, अपनी सोच और जनता के विश्वास की ताकत हो. केंद्र में कांग्रेस की भजीहत ने भाजपा के तीसरी पारी को और आसान कर दिया है. मध्यप्रदेश के शहरी क्षेत्र के युवा जिनका मत राष्ट्रीय मुद्दों पर भी निर्भर करता है, कांग्रेस के हाथ नहीं आने वाली. वोटर लिस्ट में जिस तरह युवा वोटरों की तादाद है यह कांग्रेस की दावेदारी को कमजोर करती दिखती है.
प्रस्तुति- मनीष चन्द्र मिश्र
